September 25, 2022

Veer Yado Rao

बलिदानी धुरवाराम की फंसी के बाद बस्तर में क्रांति की एक लहर उठ पड़ी ऐसे में वीर यादो राव को भी उनके सच्चे मित्र का बलिदान पुकार रहा था और उन्होंने अंग्रेजो को भागने के लिए एक बड़ा विद्रोह करने का निश्चय किया और तय किया कि एक बड़ी सेना खड़ी की जाए उन्हें विधिवत प्रशिक्षण और योजना समझा कर अंग्रेजो के विरुद्ध लड़ने को तैयार जाए, इसके लिए उन्होंने बस्तर के आदिवासियों में उत्साह जागकर नवयुवको को जोड़ना प्रारम्भ किया जिसके लिए तेलंगा और दोरला जाती के लोगो को संगठित किया गया। वीर यादो राव भोपालपट्नम जमींदारी के एक तालुके के तालुकदार थे, यादोराव ने अपने संगर्ष को गति देने के लिए अहिरी जमींदार के अंतर्गत आने वाले सोनामपल्ली के तालुकेदार बाबूराव और अरवपल्ली व घोट के जमींदार व्यंकटराव से भी संपर्क स्थापित किये। यादो राव की मोरच्बन्दी को देख कर अंग्रेज अधिकारी घबरा गए और उनके इस विद्रोह को विफल करने के लिए बड़ी रणनीति बनाई , परन्तु यादोराव के आगे सारा रणनीति विफल हो गयी और यादोराव अंग्रेज़ो से लोहा लेने के लिए बिजली की भांति दहाड़े और उन्होंने आदिवासी सेना बनाकर अंग्रेज़ो के ठिकाने पर हमला किया और रायगढ़ के परधने को लुटा। यादोराव , बाबूराव , और व्यंकटराव की सयुंक्त सेना ने 29अप्रैल 1858 को जरटलैंड हॉल तथा पीटर की सेना पर हमला किया परन्तु गार्टलैंड व हॉल संगर्ष में मरे गये और पीटर भागने में सफल रहा। अंततः अपनों की ही गद्दारी के कारण ये क्रांतिकारी अपने उद्देश्य में विफल हो गए परिणामतः यादोराव को अंग्रेजो ने गुप्तसूचना के आधार पर पकड़ लिया और 1860 में फंसी दे दी।